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Showing posts from April, 2020

#ये राहें

कुछ दूरी  तुम तय करो कुछ दूरी हम तय करें, बहुत दूर  जो जाना है जरा साथ मिल कम करें, देखी जो  एक मंजिल थी अभी बहुत दूर खड़ी है, राहों के  इन कांटो को जरा मशहूर हम मिल करें। हो साथ  तुम्हारा तो ये काटें भी फूल बन बरसे, मिलने को  ये मंजिल खुद ब खुद हमसे यूँ तरसे, कि ये मंजिल  तो बस एक पैगाम है उन गैरों लिए, जो लौट  जाते हैं उल्टे पैर इन काँटों के डर से।

#एक रिश्ता

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#एक रिश्ता एक रिश्ता जो जोड़ता तुम्हें मुझसे, उन सारी यादों से जो बिखर सी गयी उन सारी बातों से जो उलझ से गयी जो पहचानता मुझे तुमसे, एक रिश्ता। जो याद दिलाता मुझे, उन बीते लम्हों का जो मैं याद न रख सका उन मीठे जज्बातों का जो मैं भुला न सका जो  हर एक पल गिनाता तुझे, एक रिश्ता। जो ख्वाब दिखाता था मुझको, उन ऊंचाइयों को छूने का जो मैं पा न सका उन हौसलों को बुनने का जो मैं गढ़ न सका जो जीना सिखाता था तुझको, एक रिश्ता। जो थम न सका मुझसे, उन वादों के बावजूद भी जो ताउम्र के लिए थे  जो निभा न सका तुझसे, एक रिश्ता।

#लौट आ !

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जिंदगी का सफरनामा  बढ़ता चला गया इस कदर, कि ढूँढता रहा तू अपना जहां भटकते दर - बदर। फिर भी मिला न कुछ  रह गए हाथ खाली के खाली, और लौट के आना ही पड़ा मजबूरन अपने शहर। छोड़ गया था  ये कहकर कि जहां देखना बाकी है, अभी तो शुरुआत है सफर अपना बचा काफी है। पर समझ न पाया  इस छोटी सी बात को फिर भी कि, छोड़कर जंग,भागने वाले को मिलती नहीं माफी है। यूँ दर-दर भटक  चार पैंसे तो कमा लिए, अपने लिए आशियां चार मकान तो बना लिए। पर वो जन्नत जिसकी तलाश में गये थे छोड़कर, कहाँ है? देखा चारों तरफ झांककर तो कब्रस्तान बना लिए। अभी भी वक्त है, लौट आ उन चौबारों पर। खाली पड़ा है सब बना ले अपना घर। लौट आएंगी वो खुशियां फिर, जिसने तुझे संवारा था, कट जाएगा,  बाकी सफर सुकूं से महफ़िल में यूँ ऊंचा रखके सर।    

#गुमनाम रिश्ता

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यूँ तो हर रोज मुलाकात की जाती है उनसे, पर जता न सके। दिल की हर बात बता दी जाती है उनसे, पर जता न सके। हर काम की फरियाद की जाती है उनसे , पर जता न सके। यूँ तो सिर्फ एक-दूसरे से ही बातें किया करते हैं, पर अपना न सके। हर पल एक-दूसरे के बारे में ही सोचा करते हैं, पर अपना न सके। मुसीबत में खड़ा एक-दूसरे को ही पाया करते हैं, पर अपना न सके। यूँ तो हर लम्हा कट ही जाया करता है खुशी से, पर भुला न सके। जिंदगी बढ़ चली है आगे उन सभी लम्हों से, पर भुला न सके। बात पता थी होगा ऐसा भी एक बार, पहले से, पर भुला न सके। यूँ तो इस रिश्ते को बहुत से नाम दिए इस दुनिया ने, पर बता न सके। कुछ बदनाम तो कुछ गुमनाम दिए इस दुनिया ने, पर बता न सके। कुछ नाम दिया जाए इसे, सोचा खुद कई बार हमने, पर बता न सके।

#लौट आये वो

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जंगली सफारी आज सड़कों पर दौड़ रही है, बस्तियां हुई सुनसान घरों में ही घुट रही है। कुछ देख यूँ हालात मानुष ये सोच रहा है, आदम जमाने की बातें अब क्यों सच हो रही है? पढ़ा था किताबों में यूँ जंगल में रहा करते थे, हमारे पूर्वज अल्पसंख्यक हुआ करते थे। थी तादात बेजुबानों की हमसे ज्यादा तब, जो खुले आसमां में बिना आसरे रहा करते थे। जंगली सफारी आज सड़कों पर दौड़ रही है, बस्तियां हुई सुनसान घरों में ही घुट रही है। सड़कें सुनसान हैं यूँ अब शोर हुआ गायब है, कि मानो फिर से यूँ आदम जमाना आया है। शोर करने वाले यूँ खुद बेजुबां से हो बैठे हैं, मानो असल बेजुबां आज साहब बन बैठे हैं। देख ये मंजर अब कुछ यूं समझ में आता है, संतुलन बनाने वाला तो सिर्फ वही विधाता है। जंगली सफारी आज सड़कों पर दौड़ रही है, बस्तियां हुई सुनसान घरों में ही घुट रही है।

#गलती इंसान की

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यूँ तो ये मंजर कुछ इस कदर हो चला है, जहां देखो वहां बला है। तू रह कर भी कुछ न कर सका ये मानुष, ये सब उसकी ही तो कला है। छद्म देखे, द्वेष देखे और देखा ये स्वार्थ तेरा, फिर भी यूँ रह गया तू मानो छला है। अपने झूठे ख्वाबों को यूँ पूरा करते-करते, तू कुछ इस कदर गिर चला है, कि नासमझी की हदों को यूं तूने लांघकर, यूँ घोंट दिया इंसानियत का गला है। यूँ तो ये मंजर कुछ इस कदर हो चला है, जहां देखो वहां बला है। हक़ीक़त के पैगाम को यूँ जो अनदेखा कर, तूने जो खुद को यूँ झूठ से बुना है। दिखाकर झूठी शान यूँ अपने गली मुहल्लों में, खुद को खुद का ही मसीहा चुना है। ख्वाइश ये झूठी थी कि दुनिया तेरे कदमों में हो, आज खुद को यूँ अपने ही जाल में बुना है। गौर कर इस हक़ीक़त पर अब भी संभल जा, नहीं तो यम ने इस बार तुझे ही चुना है। तू रह कर भी कुछ न कर सका ये मानुष, ये सब उसकी ही तो कला है।