#लौट आ !
जिंदगी का सफरनामा
बढ़ता चला गया इस कदर,
कि ढूँढता रहा तू अपना जहां भटकते दर - बदर।
फिर भी मिला न कुछ
रह गए हाथ खाली के खाली,
और लौट के आना ही पड़ा मजबूरन अपने शहर।
छोड़ गया था
ये कहकर कि जहां देखना बाकी है,
अभी तो शुरुआत है सफर अपना बचा काफी है।
पर समझ न पाया
इस छोटी सी बात को फिर भी कि,
छोड़कर जंग,भागने वाले को मिलती नहीं माफी है।
यूँ दर-दर भटक
चार पैंसे तो कमा लिए,
अपने लिए आशियां चार मकान तो बना लिए।
पर वो जन्नत जिसकी
तलाश में गये थे छोड़कर, कहाँ है?
देखा चारों तरफ झांककर तो कब्रस्तान बना लिए।
अभी भी वक्त है,
लौट आ उन चौबारों पर।
खाली पड़ा है सब बना ले अपना घर।
लौट आएंगी वो खुशियां फिर, जिसने तुझे संवारा था,
कट जाएगा,
बाकी सफर सुकूं से महफ़िल में यूँ ऊंचा रखके सर।
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