#लौट आये वो
जंगली सफारी आज सड़कों पर दौड़ रही है,
बस्तियां हुई सुनसान घरों में ही घुट रही है।
कुछ देख यूँ हालात मानुष ये सोच रहा है,
आदम जमाने की बातें अब क्यों सच हो रही है?
पढ़ा था किताबों में यूँ जंगल में रहा करते थे,
हमारे पूर्वज अल्पसंख्यक हुआ करते थे।
थी तादात बेजुबानों की हमसे ज्यादा तब,
जो खुले आसमां में बिना आसरे रहा करते थे।
जंगली सफारी आज सड़कों पर दौड़ रही है,
बस्तियां हुई सुनसान घरों में ही घुट रही है।
सड़कें सुनसान हैं यूँ अब शोर हुआ गायब है,
कि मानो फिर से यूँ आदम जमाना आया है।
शोर करने वाले यूँ खुद बेजुबां से हो बैठे हैं,
मानो असल बेजुबां आज साहब बन बैठे हैं।
देख ये मंजर अब कुछ यूं समझ में आता है,
संतुलन बनाने वाला तो सिर्फ वही विधाता है।
जंगली सफारी आज सड़कों पर दौड़ रही है,
बस्तियां हुई सुनसान घरों में ही घुट रही है।
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