#गलती इंसान की
यूँ तो ये मंजर कुछ इस कदर हो चला है,
जहां देखो वहां बला है।
तू रह कर भी कुछ न कर सका ये मानुष,
ये सब उसकी ही तो कला है।
छद्म देखे, द्वेष देखे और देखा ये स्वार्थ तेरा,
फिर भी यूँ रह गया तू मानो छला है।
अपने झूठे ख्वाबों को यूँ पूरा करते-करते,
तू कुछ इस कदर गिर चला है,
कि नासमझी की हदों को यूं तूने लांघकर,
यूँ घोंट दिया इंसानियत का गला है।
यूँ तो ये मंजर कुछ इस कदर हो चला है,
जहां देखो वहां बला है।
हक़ीक़त के पैगाम को यूँ जो अनदेखा कर,
तूने जो खुद को यूँ झूठ से बुना है।
दिखाकर झूठी शान यूँ अपने गली मुहल्लों में,
खुद को खुद का ही मसीहा चुना है।
ख्वाइश ये झूठी थी कि दुनिया तेरे कदमों में हो,
आज खुद को यूँ अपने ही जाल में बुना है।
गौर कर इस हक़ीक़त पर अब भी संभल जा,
नहीं तो यम ने इस बार तुझे ही चुना है।
तू रह कर भी कुछ न कर सका ये मानुष,
ये सब उसकी ही तो कला है।
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