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#यादें

फरमाइशें बयां करते-करते क्यों थक से गये हो, अभी तो बस शुरुआत है क्यों रुक से गये हो? अफशोस होगा जरूर यूँ जब लौटकर पाओगे, ये उम्मीदों के आशियाने कुछ ढ़क से गये हो। वक़्त मिला था कुछ संभलने का, पर गौर न पाया, मौका जो दिया था तुम्हें पर क्यूँ ठौर न पाया? आज आना पड़ा फिर-से तुम्हें उन्हीं गलियों में, जहां कभी सिर्फ मैं ही होता कोई और न पाया। उन यादों को याद करके कुछ रुख सा गया हूँ, उन लबों की हरकतों से कुछ दुःख सा गया हूं। अब चाह कर भी उन गलियों में न लौट सकूंगा, हसीन सूरत के खयाल से कुछ रूठ सा गया हूँ। पर है कोई जो सब संभाल ही लेता है यूँ वक़्त पर, किसी को जगा तो किसी को सुला देता है तख्त पर। यूँ फिर भी गौर न कर पाया तू इस ख़ता को अपनी, लौट कर फिर यूँ आशियाँ बना डाला उसी दरख्त पर।

वक़्त

वक़्त की है ये लड़ाई , ये वक़्त को ही जीतनी है। बस वक़्त का यूँ साथ देकर , दूर से ही देखनी है। ये वक़्त की जो मार है, बिना शोर के ही सहनी है। तू रह बस दूर इतना कि, जिंदा रख पाए ये कहानी है। वक़्त का यूँ मोहरा बनकर, देख खुद को यूं गौर से। अब समझ यूँ आ रहा तुझको, दूर रहकर यूँ शोर से। यूँ दूर रहने की बातें जो, किया तो करता गर्व से। आज देख खुद को तो यूँ, कितना अलग तू खुद ही से। समझ गया है दिल अब तो यूँ, खुद के ही समझाने से। लड़ते रहेंगे ये लड़ाई, अब खुद के ही आशियाने से। वक़्त की है ये लड़ाई, ये वक़्त को ही जीतनी है । बस वक़्त का यूँ साथ देकर, दूर से ही देखनी है। जहां, जैसे,  जिस हाल में हो, सब कुछ ठीक ही तो है। कम से कम जिंदा तो हो, ये वक़्त की मेहरबानी तो है। कुछ समझ गए हैं इसको, कुछ को समझाना बाकी है। वक़्त पर यूँ छोड़ दो उनको,एक छोटा कफ़न ही काफी है। वक़्त की है ये लड़ाई , ये वक़्त को ही जीतनी है। बस वक़्त का यूँ साथ देकर , दूर से ही देखनी है। अंकित बिष्ट.