#कश्ती
कागज की कश्ती लिए हम यूँ चल दिये इस दरिया में कि मानो आज पार ही कर लेंगें पर उतरने से पहले ये ध्यान ही ना था कि वो कश्ती ही क्या? जिसमें पतवार का सहारा ही न हो। डूबे कुछ इस कदर इस दरिया में और हाथ आये इस तिनके का सहारा कब तक लेंगें। डूबते को तिनके का सहारा ये सोचा था उस वक़्त पर उसने भी ये कहते कहते दम तोड़ दिया कि आज किसी की जान कह के लेंगें। न काम आयी वो कश्ती और ना ही वो तिनका, काम तो आया सिर्फ एक चेहरा खयाल था जिनका, डूबने भी नहीं देती यारों वो निगाहें अब तो हमको यूँ तेरी याद में ही सही पर जी लेंगें।
Comments
Post a Comment