#यादें

फरमाइशें बयां करते-करते क्यों थक से गये हो,
अभी तो बस शुरुआत है क्यों रुक से गये हो?
अफशोस होगा जरूर यूँ जब लौटकर पाओगे,
ये उम्मीदों के आशियाने कुछ ढ़क से गये हो।
वक़्त मिला था कुछ संभलने का, पर गौर न पाया,
मौका जो दिया था तुम्हें पर क्यूँ ठौर न पाया?
आज आना पड़ा फिर-से तुम्हें उन्हीं गलियों में,
जहां कभी सिर्फ मैं ही होता कोई और न पाया।
उन यादों को याद करके कुछ रुख सा गया हूँ,
उन लबों की हरकतों से कुछ दुःख सा गया हूं।
अब चाह कर भी उन गलियों में न लौट सकूंगा,
हसीन सूरत के खयाल से कुछ रूठ सा गया हूँ।
पर है कोई जो सब संभाल ही लेता है यूँ वक़्त पर,
किसी को जगा तो किसी को सुला देता है तख्त पर।
यूँ फिर भी गौर न कर पाया तू इस ख़ता को अपनी,
लौट कर फिर यूँ आशियाँ बना डाला उसी दरख्त पर।

Comments

Popular posts from this blog

#कश्ती

#गुमनाम रिश्ता

#एक रिश्ता