वक़्त
वक़्त की है ये लड़ाई , ये वक़्त को ही जीतनी है।
बस वक़्त का यूँ साथ देकर , दूर से ही देखनी है।
ये वक़्त की जो मार है, बिना शोर के ही सहनी है।
तू रह बस दूर इतना कि, जिंदा रख पाए ये कहानी है।
वक़्त का यूँ मोहरा बनकर, देख खुद को यूं गौर से।
अब समझ यूँ आ रहा तुझको, दूर रहकर यूँ शोर से।
यूँ दूर रहने की बातें जो, किया तो करता गर्व से।
आज देख खुद को तो यूँ, कितना अलग तू खुद ही से।
समझ गया है दिल अब तो यूँ, खुद के ही समझाने से।
लड़ते रहेंगे ये लड़ाई, अब खुद के ही आशियाने से।
वक़्त की है ये लड़ाई, ये वक़्त को ही जीतनी है ।
बस वक़्त का यूँ साथ देकर, दूर से ही देखनी है।
जहां, जैसे, जिस हाल में हो, सब कुछ ठीक ही तो है।
कम से कम जिंदा तो हो, ये वक़्त की मेहरबानी तो है।
कुछ समझ गए हैं इसको, कुछ को समझाना बाकी है।
वक़्त पर यूँ छोड़ दो उनको,एक छोटा कफ़न ही काफी है।
वक़्त की है ये लड़ाई , ये वक़्त को ही जीतनी है।
बस वक़्त का यूँ साथ देकर , दूर से ही देखनी है।
अंकित बिष्ट.
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